Junglee Movie Review: बहुत निराश करती है विद्युत जामवाल की ‘जंगली’

Junglee Movie Review: बहुत निराश करती है विद्युत जामवाल की ‘जंगली’

फिल्म रिव्यू: जंगली

फिल्म की कहानी को आगे बढ़ाने की बजाए निर्देशक ने विद्युत जामवाल की बॉडी और स्टंट दिखाने पर समय बिताया है। एक समय पर जाकर आप बोर हो जाते हैं।

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Junglee Movie Review: हाथियों को बॉलीवुड में इतनी बार कहानी की मेन थीम में रखा गया है कि विद्युत जामवाल की फिल्म के लिए कुछ नया करना मुश्किल ही था. हाथियों के रंग, उनके खेल, हाव भाव को कई बार हिंदी फिल्मों में दिखाया गया है. इस फिल्म में भी एक बार फिर मानव और इस भारी भरकम जीव के साथ रहने की घिसी पिटी कहानी को दोहराया गया है.इस फिल्म के ट्रेलर को देख कर लगा था कि ‘हाथी मेरे साथी’ का एक मज़ेदार रीमेक हमारे सामने होगा लेकिन इस कहानी में सबकुछ कम ही रह जाता है.इस फिल्म की शुरुआत कुछ बेहतरीन दृश्यों के साथ होती है जिसमें एक हरे भरे जंगल में हाथियों के झुंड को दौड़ते हुए दिखाया गया है और इसी जंगल में मौजूद है, चंद्रिका, जो एक वन्य सरंक्षण केंद्र है. इस केंद्र को एक बूढ़े बाबा अपने स्टाफ के साथ मिलकर चलाते हैं. बाबा का बेटा राज नायर (विद्युत), पशु चिकित्सक, अपने जानवरों को बहुत अच्छे से जानता है फिर चाहे वो तोते हों, साँप हो या फिर हाथी. पिता और बेटे के बीच कुछ अनसुलझे मुद्दे हैं जिनकी वजह से बेटा, पिता से दूर शहर में रहता है. इस सब के बीच शिकारियों का एक गिरोह भी है जो हाथियों के झुंड के सरगना भोला को मारना चाहता है.

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अफसोस इस बात का है कि जहां लेखक रितेश शाह को आसानी से इस कहानी को राज और शिकारियों के बीच की जंग की तरह से दिखाना था, वो इसके लिए बहुत समय ले लेते हैं. इस कहानी में बहुत सारा मज़ा, जानकारी जोड़ी जा सकती थी लेकिन कहानी बोझिल है और दिल को छूती नहीं है. वैसे ये जानना दिलचस्प होगा कि हाथी मेरे साथी, जो की एक दक्षिण भारतीय फिल्म का रीमेक थी, के लेखक सलीम-जावेद थे. लेकिन चक रसल और एडम प्रिंस का स्क्रीनप्ले बहुत कमज़ोर है और फिल्म न हॉलीवुड की रह पाती है और न ही बॉलीवुड की ही बन पाती है.

विद्युत जामवाल उन चंद हीरोज़ में से हैं जो टाइगर श्रॉफ की तरह एक्शन स्टंट को कर सकते हैं. जंगली में वो इसे हाइलाइट भी करते हैं लेकिन ज़रुरत से ज्यादा समय इस पर ही लगाया है. हमारा हीरो, जंगल का असली बेटा है इस पर कई सारे क्लोज़ अप और एक्शन शॉट खराब किए गए हैं. जब तक कहानी शुरु होती है तब तक ऑडियंस बोर हो चुकी होती है. फिल्म में अतुल कुलकर्णी और अक्षय ओबेरॉय जैसे कलाकारों को बिल्कुल वेस्ट कर दिया गया है. फिल्म में दो लड़कियों ने डेब्यू किया है और आशा भट्ट और पूजा सावंत अपना काम ठीक से करते हैं लेकिन स्क्रिप्ट में उनके लिए कुछ खास काम था ही नहीं.

निर्देशक के तौर पर रसल ने इस फिल्म में वो जादू पैदा नहीं किया जो वो अपनी हॉलीवुड फिल्मों में कर चुके हैं. हॉलीवुड से आए सिर्फ कुछ ही निर्देशक भारतीय कहानियों को ठीक से कह पाए हैं लेकिन चक रसल ऐसा नहीं कर पाते हैं.इस हफ्ते हाथियों पर दो फिल्में आ रही हैं एक जंगली और एक हॉलीवुड की एनिमेटेड फिल्म ‘डंबो’ जिसमें से डंबो को ज्यादा प्यार मिलने वाला है ये तय है.

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डिटेल्ड रेटिंग

कहानी:
स्क्रिनप्ल:
डायरेक्शन:
संगीत:

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First published: March 29, 2019, 3:31 PM IST

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