MOVIE REVIEW : क्या आप अपने घर में सुरक्षित हैं, सोचने पर मजबूर कर देगी 'पीहू'?

ज़्यादातर भारतीय परिवारों में बच्चे के जन्म के बाद करीब 7-8 साल तक उन्हें ऐसी सभी चीज़ों से दूर रखा जाता है जिनसे किसी भी तरह का खतरा हो. अपने आस-पास हम अक्सर देखते हैं कि बच्चों को आग, ऊंचाई, पानी या ऐसी ही खतरनाक चीज़ों से दूर रखने के लिए परिवार वाले सारे जतन करते हैं. लेकिन फिर भी एक ऐसी चीज़ है जिससे वह उसे नहीं बचा पाते. वो है माता-पिता की लड़ाई. ऐसी ही एक लड़ाई और उसके बाद के असर की कहानी है फिल्म ‘पीहू’.2 साल की बच्ची पीहू (मायरा विश्वकर्मा) के जन्मदिन के अगले दिन उसकी मां की लाश बिस्तर पर पड़ी हुई है लेकिन उसे लगता है वह सो रही है. बार-बार उठाने पर भी जब मां नहीं उठती तब पीहू खुद ही अपने काम करने लगती है. फिर उसका सामना होता है उन सभी खतरों से जिन्हें फिल्म के ट्रेलर में दिखाया गया है.

फिल्म के कुछ सीन्स को हटा दें तो पूरी फिल्म में सिर्फ पीहू ही पर्दे पर दिखती है. बाकी सभी किरदार मसलन उसके पिता, उसकी मां की दोस्त, सोसायटी का गार्ड, पड़ोसी सबकी सिर्फ आवाजें सुनाई देती हैं. इतनी छोटी बच्ची से इतनी शानदार एक्टिंग कराना काबिल-ए-तारीफ़ है और निर्देशक की इस बात के लिए तारीफ करनी होगी.

फिल्म में किसी बड़े अभिनेता का नाम का इस्तेमाल नहीं हुआ है और ऐसे में इस फिल्म को बिना किसी बड़े पीआर प्रमोशन के रिलीज़ करना अपने आप में साहसिक कदम रहा है.

फिल्म शुरू होने के करीब 15 मिनट बाद से ही पीहू की जान पर मुश्किलें आनी शुरु हो जाती हैं. यही फिल्म में थ्रिल पैदा करता है और पीहू बच सकेगी या नहीं सस्पेंस क्रिएट होता है जिसे हम यहां ब्रेक नहीं करेंगे.

फिल्म में रोंगटे खड़े कर देने वाले कई शॉट हैं, 2 साल की बच्ची से एक्टिंग करवाना अपने आप में एक साहसिक काम है लेकिन दो घंटे तक एक ही स्टोरीलाइन के दम पर फिल्म चलाना थोड़ा लंबा लगता है.

Pihu film

पीहू फिल्म में बच्ची पर खतरा लगातार रहता है और दर्शकों को ये डर सताता है कि बच्ची को कहीं कुछ हो न जाए.

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फिल्म किसी एक बात के प्रति इशारा नहीं करती, न ये गुड और बैड पेरेंटिंग के प्रति जागरुक करती है और न ही कोई अन्य संदेश देती है. छोटी सी बात पर खुदकुशी, मां का लापरवाह रवैय्या, पिता का बच्ची के लिए ज्यादा कंसर्न जैसी बातें सामने आती हैं लेकिन मूल मुद्दा साफ नहीं होता.विनोद ने अपनी पिछली फिल्म ‘मिस टनकपुर हाज़िर हों’ में सिस्टम और सोसाइटी का एक बड़ा नेक्सस दिखाया था लेकिन इस फिल्म में कहानी के नाम पर घर में मौत से जूझती एक बच्ची की कहानी है जो रोमांच तो पैदा करती है लेकिन संदेश नहीं देती.

हालांकि इस फिल्म के बाद शहरों में रहने वाले एकल मां बाप थोड़ा सावधान होंगे और अपने घरों में कुछ आमूल चूल बदलाव करेंगे ताकि उनका घर किसी दुर्घटना का स्थल न बने.

फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर लगातार आपको स्क्रीन से निगाहें हटाने नहीं देता लेकिन लगातार पैदा होता डर एक समय के बाद गुस्सा दिलाता है.

इस फिल्म की रिलीज़ से पहले प्रचार के लिए फिल्म की टीम ने एक बच्ची से लोगों को फोन कॉल करवाए थे जिसमें बच्ची मदद मांग रही थी. इस तरह के प्रचार के लिए उन्हें खासा आलोचना का सामना करना पड़ा था पर फिल्म देखने  पर साफ होता है कि पूरी थीम इसी सस्पेंस के इर्द गिर्द बनी है.

इस फिल्म को देखकर विक्रमादित्य मोटवाने की फिल्म ‘ट्रैप्ड’ की याद आती है, बस फर्क ये है कि फिल्म का नायक एक अडल्ट नहीं बल्कि एक 2 साल की बच्ची है और जहां वो नायक खुद को बचाने के लिए कोशिशें कर सकता है, बच्ची खुद के लिए परेशानियां खड़ी कर सकती है. कुल मिलाकर कह सकते हैं कि ये फिल्म आपको परेशान कर सकती है और आप खुद को भी एक कमरे में बंद पाएंगे जहां कभी भी कुछ भी हो सकता है.

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