MOVIE REVIEW : सारा अली खान की पहली फिल्म नहीं लगती 'केदारनाथ'

MOVIE REVIEW : सारा अली खान की पहली फिल्म नहीं लगती 'केदारनाथ'

फिल्म के एक सीन में सारा अली खान और सुशांत राजपूत

सैफ अली खान और अमृता सिंह की बेटी सारा अली खान ‘केदारनाथ’ के साथ अपना बॉलीवुड डेब्यू शुरु कर चुकी हैं.

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पिछले 2-3 महीनों में कुछ बेहतरीन प्रेम कहानियां भारतीय दर्शकों को देखने को मिली हैं. अनुराग कश्यप की ‘मनमर्जियां’, साजिद अली की ‘लैला-मजनूं’ के बाद अब ‘केदारनाथ’ भी अपने साथ एक फ्रेशनेस वाली प्रेम कहानी लेकर आई है. इस फिल्म का लीड कपल, इस फिल्म का केंद्र बिंदु है और वो अपनी केमिस्ट्री को पर्दे पर खूबसूरती से उकेरते हैं. बाकी काम बैकग्राउंड में दिखने वाली खूबसूरत लोकेशन ने संभाल लिया है और आप फिल्म के पहले भाग में तो खुशनुमा महसूस करते हैं.वैसे तो ‘केदारनाथ’, 2013 में केदारनाथ मंदिर और आस-पास के इलाके में आए सैलाब और वहां के निवासियों की कहानी पर आधारित है लेकिन फिल्म में मुस्लिम युवक और हिंदू युवती के प्रेम के एंगल को भी डाला गया है. इस कारण फिल्म पर कई धार्मिक संगठनों को आपत्ति भी थी और फिल्म की रिलीज़ पर रोक की मांग भी की जा रही थी.

लेकिन दो विपरीत धर्म के लोगों में प्यार वाली कहानियां बॉलीवुड में कई बार बनी है और निर्देशक भी इस एंगल पर फिल्म को आधारित नहीं करना चाहते थे इसका एहसास आपको फिल्म देखते समय हो ही जाएगा.

नायक और नायिका के धर्म को बार-बार स्क्रीन पर दोहराया नहीं जाता और फिल्म के संवाद भी आपको इस ओर से कहीं और ले जाते हैं. फिल्म की कहानी शुरू होती है एक लड़की मंदाकिनी (सारा अली खान) के साथ, जो अपने स्वभाव से विद्रोही है. उनके पिता के किरदार में नितीश भारद्वाज नज़र आए हैं जो फिल्म में केदारनाथ मठ के मुख्य पुजारी भी हैं.

मंदाकिनी की बहन को पसंद करने आया लड़का मंदाकिनी को पसंद करता है और उससे शादी करना चाहता है. इस प्रस्ताव को मंदाकिनी का परिवार स्वीकार कर लेता है लेकिन जैसा कि मंदाकिनी का व्यक्तिव है वह इससे इंकार कर देती है. इसके बाद सारा इस शादी से बचने के लिए कोई प्रेमी खोजने लगती है, जो कम से कम, इस शादी को टालने का कारण बन सके.

एंट्री लेते हैं मंसूर (सुशांत सिंह राजपूत), एक पिट्ठू जो कुछ मुलाकातों में मंदाकिनी से प्यार कर बैठता है. निर्देशक अभिषेक कपूर ने फिल्म में मंदाकिनी और मंसूर के बीच की प्रेम कहानी को बहुत सुंदर तरीके से फिल्माया है. प्रेम कहानी में कई संदेश आसानी से घोले गए हैं मसलन केदारनाथ में बढ़ता अतिक्रमण और प्रशासन की इस ओर होने वाली अनदेखी.

फिल्म में मंसूर और मंदाकिनी के प्रेम को सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश भी दिखाई देती है लेकिन इसके बाद ही पूरा फोकस त्रासदी पर घूम जाता है और इस त्रासदी का इस प्रेम कहानी पर क्या असर पड़ता है देखने के लिए आपको ये फिल्म देखनी होगी.

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एक प्राकृतिक आपदा पर बनी कहानी में प्रेम कहानी लाने के लिए आपको स्क्रिप्ट में जो जोड़ तोड़ करने पड़ते हैं इस फिल्म में बस वही कम है. इसके अलावा फिल्म अच्छी है, विजुअल्स और ग्राफिक्स पर और काम हो सकता था लेकिन फिल्म का जितना बजट है उतने बजट में वो ठीक ही हैं.केदारनाथ की लोकेशन को फिल्म में अच्छे से दर्शाया गया है. सिनेमैटोग्राफी बेहतरीन है. तुषार कांति रॉय का काम अच्छा है. इसके अलावा फिल्म में गीत-संगीत औसत है.

अब बात फिल्म से अपने करियर की शुरुआत कर रहीं सारा अली खान की. सारा में आपको उनकी मां अमृता सिंह की छवि बार बार दिखेगी. सारा को देख कर बिल्कुल नहीं लगता कि ये उनकी पहली फिल्म है. वो अपने किरदार को बखूबी निभाती हैं और सवांद अदायगी भी अच्छे से करती हैं. कुल मिलाकर इस वीकेंड अगर आप सिनेमा जाना चाहते हैं तो केदारनाथ जाइए इस फिल्म को देखना (पहला भाग) एक सुंदर अहसास है.

डिटेल्ड रेटिंग

कहानी:
स्क्रिनप्ल:
डायरेक्शन:
संगीत:

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First published: December 7, 2018, 12:29 PM IST

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