Photograph Movie Review: रितेश बत्रा की फिल्म मुंबई और यहां के कामगार लोगों को एक सलाम है

निर्देशक रितेश बत्रा की पिछली फिल्म लंचबॉक्स को दुनिया भर के फिल्म फेस्टिवल में सराहना मिली थी और इस फिल्म को भले ही बॉक्स ऑफिस पर सफलता न मिली हो लेकिन फिल्म को भारत की सर्वश्रेष्ठ फिल्मों में गिना गया. अब रितेश अपनी अगली फिल्म ‘फोटोग्राफ’ के साथ हमारे सामने हैं और इस बार भी उनकी इस फिल्म को सनडांस (Sundance) और बर्लिन (Berlin) फिल्म फेस्टिवल में सराहना मिली है. हालांकि फिल्म फेस्टिवल की फिल्मों के साथ एक आम धारणा ये भी जोड़ दी गई है कि ऐसी सभी फिल्मों को दुनियाभर में भले ही पसंद किया जाए, वो घरेलू मैदान पर दर्शकों को नहीं लुभा पाती.नवाज़ुद्दीन और सान्या मल्होत्रा के अभिनय से सजी फोटोग्राफ के साथ भी ऐसा ही होगा. फिल्म को जब दिखाया जा रहा था तो इस फिल्म को लेकर लोगों के बहुत अलग अलग विचार थे, मेरे विचार में ये फिल्म अच्छी है. रितेश बत्रा, जो इस फिल्म के निर्देशक और लेखक दोनों हैं, इससे पहले द लंचबॉक्स, द सेन्स ऑफ एन एंडिंग या ऑवर सोल्स एट नाइट जैसी फिल्में बना चुके हैं. वो ऐसी कहानी को बनाते हैं जहां लोगों को अपने अकेलेपन से राहत मिलती है और वो भी किसी अनजाने शख्स, दोस्त या चेहरे में.

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फोटोग्राफ फिल्म है एक फोटोग्राफर रफी (नवाज़) जो उत्तर प्रदेश से इस शहर में अपनी आजीविका को चलाने आता है. मिलोनी (सान्या मल्होत्रा) एक गुजराती लड़की है जो रफी की तरह इस शहर से कुछ पाना चाहती है. ये दो अलग अलग किरदार गेटवे ऑफ इंडिया पर टकराते हैं जहां मुंबई का हर यात्री एक न एक बार आता है.

अपने परिवार से बिछड़ी मिलोनी को रफी अपने कैमरा में कैद कर लेता है और इन हज़ारों लोगों की भीड़ में इन दो किरदारों के बीच एक रिश्ता बन जाता है. मिलोनी इन तस्वीरों में बेहद खुश नज़र आती है, अपनी असल ज़िंदगी से ज्यादा और इस खुशी को पैदा करने वाला एक अंजान आदमी है – वो फोटोग्राफर – रफी.

रितेश ने जिस खूबसूरती से हिंदी फिल्म के बनी बनाई परिपाटी को तोड़ा है – वो खूबसूरत है. अमीर लड़की – गरीब लड़के के बीच के प्यार के अलावा भी कहानियां कही जा सकती हैं. रफी और मिलोनी एक दूसरे की ज़िंदगी में अकेलापन भरते हैं जो कोई और नहीं भर पाता. ये वैसा ही रिश्ता था, जैसा इला (सिमरत कौर) और साजन (इरफान) ‘द लंचबॉक्स’ में शेयर करते हैं. ये जोड़ी भले ही मिल नहीं सकती, लेकिन जब तक वो साथ हैं, एक दूसरे को उम्मीद और खुशी देते रहते हैं.

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चुनाव में पहली बार नहीं उड़ रही है अक्षय कुमार के नाम की अफवाह, इन सीटों पर भी आ चुकी हैं ऐसी खबरेंरफी की दादी (फारुख जफर) फिल्म में वो ज़रुरी हंसी मज़ाक लाती है जो इसे हल्का बनाए रखता है. दादी का पोते के लिए लड़की ढूंढने की ज़िद, भूख हड़ताल जहां कहानी में एक फन एलिमेंट लाती है वहीं दो किरदारों को मिलाती भी है और ये निर्देशक की समझदारी को दिखाता है.

रितेश की फिल्मों में रफ्तार हमेशा सहज रहती है. सवांद सीधे हैं – चाहे वो उत्तर प्रदेश की रंगबाज़ी वाली भाषा हो या बंबई के कैब ड्राइवर्स की चपल चालाक बातें – वो अपना काम बखूबी करते हैं. फिल्म की डिटेल पर बहुत काम किया गया है. जिम स्राभ इस फिल्म में एक अकाउंट्स टीचर के रोल में हैं और उनकी क्लास से लेकर उनका चित्रण बेहद खूबसूरत है. रफी और उसके दोस्त के कमरे को भी बहुत डिटेल से दिखाया गया है और ये डिटेलिंग ही इस फिल्म को मुंबई की कहानी बना देती है.

रफी के किरदार में नवाज़ुद्दीन ने बेहतरीन काम किया है और उनका धैर्य उनके किरदार के प्रोफेशन से मेल खाता है. वो इतने प्रभावशाली ढंग से काम करते हैं कि ये कहना मुश्किल हो जाता है कि वो अभिनय कर रहे हैं. सान्या मल्होत्रा का किरदार थोड़ा कम लिखा गया है लेकिन वो भी अपने रोल को बखूबी निभाती हैं. इसके अलावा अन्य अभिनेताओ का चुनाव भी अच्छा है.

आकाश सिन्हा, गीतांजलि कुलकर्णी और विजय राज़ के छोटे छोटे किरदार भी कहानी के साथ मेल खाते हैं. लेकिन फारुख ज़फर इस पूरे कास्ट में सबसे ताकतवर दिखती हैं और अपनी अभिनय क्षमता से सबपर हावी हो जाती हैं. नवाज़ और दादी के बीच के सवांद बेहद ज़िंदादिल और समझदारी भरे हैं.

इस फिल्म को बॉक्स ऑफिस पर क्या हासिल होगा, कह नहीं सकते, लेकिन इस फिल्म में वो जादू है जो लाखों लोगों को सपनों के शहर मुंबई तक खींच लाता है और आमची मुंबई से प्यार करवा देता है.

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