VIDEO: पत्नी से 10 हजार रुपए लेकर खड़ी की अरबों की कंपनी

देश की दूसरी सबसे बड़ी आईटी कंपनी इन्फोसिस से तो सब लोग वाकिफ हैं. लेकिन यह कम लोग ही जानते होंगे कि नारायण मूर्ति ने अपनी पत्नी सुधा से 10 हजार रुपए उधार लेकर इन्फोसिस की नींव रखी थी. आपको बता दें कि फिलहाल इन्फोसिस देश की दूसरी सबसे बड़ी कंपनी है और उसकी मार्केट वैल्यू 2.7 लाख करोड़ रुपये है. आइए जानते हैं इन्फोसिस के सफर के बारे में…पत्नी के 10 हजार रुपए से शुरू हुई इन्फोसिस-सुधा मूर्ति की इन्फोसिस कंपनी की स्थापना में अहम भूमिका रही है. उनकी बचत के दस हजार रुपए से इस कंपनी की नींव रखी गई थी. उस वक्त इनके पास इतने पैसे भी नहीं थे कि कंपनी के लिए कोई कमरा भी किराए पर ले सकें. शुरू होने के 6 महीने बाद 2 जुलाई, 1981 को कंपनी का रजिस्ट्रेशन इन्फोसिस प्राइवेट लिमिटेड के नाम से हुआ, जिसमें ऑफिस का पता मूर्ति के दोस्त और कंपनी में पार्टनर राघवन के घर का दिया गया. हालांकि, मूर्ति के घर के अगले भाग में स्थित कमरा ही उनका इंफोसिस का ऑफिस था.

ऐसे बनाई इन्फोसिस टीम- 1981 में नारायण मूर्ति, नंदन निलेकणी, एस गोपालकृष्णन, एसडी शिबुलाल, के दिनेश और अशोक अरोड़ा ने पटनी कंप्यूटर्स छोड़कर पुणे में इन्फोसिस कंसल्टेंट प्राइवेट लिमिटेड की शुरुआत की थी. सन 1983 में उन्हें न्यूयॉर्क की कंपनी डेटा बेसिक कॉर्पोरेशन से पहला ऑर्डर मिला था. फिलहाल कंपनी के कर्मचारियों की संख्या 50 हज़ार से अधिक है और 12 देशों में कंपनी की शाखाएं हैं.

ऐसे बनाई इन्फोसिस टीम-1981 में नारायण मूर्ति, नंदन नीलेकणी, एस गोपालकृष्णन, एसडी शिबुलाल, के दिनेश और अशोक अरोड़ा ने पटनी कंप्यूटर्स छोड़कर पुणे में इन्फोसिस कंसल्टेंट प्राइवेट लिमिटेड की शुरुआत की थी. 1983 में उन्हें न्यूयॉर्क की कंपनी डेटा बेसिक कॉर्पोरेशन से पहला ऑर्डर मिला था.फिलहाल, कंपनी के कर्मचारियों की संख्या 50 हज़ार से अधिक है और 12 देशों में कंपनी की शाखाएं हैं.

…नहीं मानी हार-नारायण मूर्ति का हौसला ही था कि इन्फोसिस इस मुकाम पर पहुंच पाई. एक वक्त ऐसा भी था जब कंपनी की हालत को देखते हुए कंपनी में मूर्ति के अन्य पार्टनर इसे बेच दिए जाने का विचार कर रहे थे. 1989 में केएसए के खत्म होने से इन्फोसिस संकट में पड़ गया. एक संस्थापक अशोक अरोड़ा भी कंपनी छोड़ चुके थे. दूसरे फाउंडर्स को आगे कुछ सूझ नहीं रहा था. तभी मूर्ति सामने आ गए. उन्होंने साथियों से कहा, अगर आप सभी कंपनी छोड़ना चाहते हैं तो आप जा सकते हैं. लेकिन, मैं नहीं छोड़ूंगा और कंपनी को बनाऊंगा.’ निलेकणी, गोपालकृष्णन, शीबूलाल, दिनेश और राघवन ने रुकने का फैसला किया और तब से सभी जुड़े हुए हैं.

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आम लोगों को एंट्री-इन्फोसिस के शेयर 1993 में सार्वजनिक कर दिए गए. कंपनी का नाम भी बदल दिया गया और उसे अब इन्फोसिस टेक्नोलॉजीज नाम दे दिया गया. पब्लिक ऑफरिंग्स के तहत शुरू-शुरू में एक शेयर का दाम 95 रुपये रखा गया. 1994 में 450 रुपये प्रति शेयर की दर से 5,50,000 शेयर पब्लिक को ऑफर किए गए.नैस्डैक में लिस्टिंग-साल 1999 में इन्फोसिस ने 100 मिलियन डॉलर का आंकड़ा छू लिया. इसी साल यह नैसडैक में लिस्टेड होनेवाली भारत की पहली आईटी कंपनी बन गई. 1999 में कंपनी के शेयर के दाम 8,100 रुपए तक पहुंच गया. इसके साथ ही यह सबसे महंगा शेयर बन गया. तब इन्फोसिस मार्केट कैपिटलाइजेशन के लिहाज से नैसडैक में लिस्टेड 20 बड़ी कंपनियों में शामिल हो गया.

नैस्डेक में लिस्टिंग-1999 में इन्फोसिस ने 100 मिलियन डॉलर का आंकड़ा छू लिया. इसी साल यह नैस्डेक में लिस्टेड होने वाली भारत की पहली आईटी कंपनी बन गई. 1999 में कंपनी के शेयर के दाम 8,100 रुपए तक पहुंच गए. इसके साथ ही यह सबसे महंगा शेयर बन गया. तब इन्फोसिस मार्केट कैपिटलाइजेशन के लिहाज से नैस्डेक में लिस्टेड 20 बड़ी कंपनियों में शामिल हो गई.

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